CG MP GJ छत्तीसगढ़ और गुजरात के बाद MP में मिला दुर्लभ पेड़, त्रिशूल जैसी है आकृति, जानिए खासियत

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बैतूल जिले के बारहवीं गांव के पास बगई में पांच शाखाओं वाला छींद का एक पेड़ अचानक चर्चा में आ गया है. पेड़ त्रिशूल की आकृति का है इसलिए लोग इसे चमत्कारिक मानने लगे हैं. आदिवासी अंचल के भूमकाओं ने यहां अंधविश्वास का दरबार सजा लिया है. दावा किया जा रहा है कि इस पेड़ के पास पहुंचने से बीमारी ठीक हो रही हैं. देश में एक से ज़्यादा शाखाओं वाले दुर्लभ तीन पेड़ों में से यह एक है. दुर्लभ पेड़ को लेकर वनस्पति शास्त्री रिसर्च कर रहे हैं. इससे पहले छत्तीसगढ़ के राइकोटा में छह शाखाओं वाला छींद का पेड़ मिला था, वहीं गुजरात के सौराष्ट्र में दो शाखाओं वाला छींद का पेड़ देखा गया था. इस लिहाज से एक से अधिक शाखाओं वाला ये देश का तीसरा छींद का पेड़ है.

बैतूल टॉक्स। . मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में छींद का एक पेड़अचानक चर्चा में आ गया है. पेड़ त्रिशूल की आकृति का है इसलिए लोग इसे चमत्कारिक मानने लगे हैं. आदिवासी अंचल के भूमकाओं ने यहां अंधविश्वास का दरबार सजा लिया है. दावा किया जा रहा है कि इस पेड़ के पास पहुंचने से बीमारी ठीक हो रही हैं.

Betul Chhind Tree. आम तौर पर छींद के पेड़ में एक ही शाखा होती है लेकिन बैतूल जिले के बारहवीं गांव के पास बगई में पांच शाखाओं वाला छींद का एक पेड़ है.

आम तौर पर छींद के पेड़ में एक ही शाखा होती है लेकिन बैतूल जिले के बारहवीं गांव के पास बगई में पांच शाखाओं वाला छींद का एक पेड़ है. देश मेंं एक से ज़्यादा शाखाओं वाले दुर्लभ तीन पेड़ों में से यह एक है. बैतूल में इस दुर्लभ पेड़ को लेकर वनस्पति शास्त्री रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ यहां अंधविश्वास का मेला भी लगने लगा है. रोजाना यहां सैकड़ों लोग पूजा पाठ करने आते हैं.

छत्तीसगढ़ और गुजरात के बाद तीसरा पेड़ मप्र में
छींद का पेड़ बैतूल से 20 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत बारहवीं के पास बगई नामक स्थान पर लगा है. इस पेड़ में पांच शाखाएं निकल आई हैं. इससे पहले छत्तीसगढ़ के राइकोटा में छह शाखाओं वाला छींद का पेड़ मिला था, वहीं गुजरात के सौराष्ट्र में दो शाखाओं वाला छींद का पेड़ देखा गया था. इस लिहाज से एक से अधिक शाखाओं वाला ये देश का तीसरा छींद का पेड़ है. जिस किसान के खेत में लगा ये पेड़ दुर्लभ है ये किसान को भी नहीं मालूम था.

रिसर्च की जरूरत
इस बारे में विवेकानंद कॉलेज में बॉटनी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर सुदामा लहरपुरे कहते हैं कि इस दुर्लभ पेड़ को लेकर रिसर्च होना चाहिए क्योंकि वनस्पति शास्र में इस तरह के दुर्लभ पेड़ पौधों के विकास को लेकर वैज्ञानिक तथ्य मौजूद हैं. इसे अंधविश्वास का दरबार बनाना ग़लत है. इसे आस्था नहीं विज्ञान के नजरिये से परखने की ज़रूरत है.

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